पाळिभासा
| पाळि | |
|---|---|
| युगं | बीसी पञ्चसतपुब्ब तो एकसतपुब्ब[१] |
| भासा कोड | |
| ISO 639-1 | pi |
| ISO 639-2 | pli |
| ISO 639-3 | pli |
pli | |
| Glottolog | pali1273 |

पाळिभासा जम्बुदीपस्स अन्तोदेसे जातानं मनुस्सानं मातुभासा अहोसि॥ इमस्स भासास्स महन्तेन पमाणेन अज्झयनकरणस्स हेतु सब्बञ्ञुबुद्धस्स अनग्घानि सासनिकगन्थानि तिपिटके पाळिभासाय सङ्गहेत्वा ठपितत्ता होति॥
मूलसन्तकिञ्च भासाय उपचियमानअक्कम
[सम्पादेतु]वोहारयोनि
[सम्पादेतु]पाळि इति सद्दं थेरवादबुद्धमामकेहि उपयुत्तं अहोसि॥ सुतेसिनो पाळि सद्दस्स अत्थं धातुञ्च नानाविधं विवरन्ति। लिखनरूपम्पि न समं होति॥ R. C. Childers पाळि इति "आवलि" अत्थो होतीति आह॥[२]
पाळिभासाय अन्तिकतरं दिस्समानं सासनिक इहानि अधिप्पायं पच्छिम जम्बुदीपे गुज्जररट्ठे धम्मासोकमहाराजस्स सिलालेखा भवन्ति॥[३]
मरम्मरट्ठे विभावना
[सम्पादेतु]पाळिभासाय मूलट्ठानं सक्कतभासाया विय जम्बुदीपोयेव होति॥ जम्बुदीपेपि मगधरट्ठे भासितत्ता इमं मागधभासा ति वुच्चति॥ लोके पठमं उप्पन्नभासा ताव होति। तस्मा मूलभासा तिपि वुच्चति॥ तं मागधमूलभासां कप्पादिका मनुस्सा च। ब्रह्मानो च। अञ्ञेसं सद्दं अस्सुतपुब्बा दहरा कुमारा च। सम्मासम्बुद्धा च भासन्ती ति गन्थेसु आगतं॥ एवं कप्पादितो पट्ठाय आगता एसा पाळिभासा दोसकलङ्केहि विमुत्ता सुद्धा निज्जटा मूलभासायेव होति॥ अञ्ञासु अञ्ञतरासु भासासु अक्खरानं बहुत्ता अत्थानं संकिण्णता। दुब्बुज्झनता। परिपुण्णवोहारानं अभावो। विसज्जनीयस्स बहुत्ता। नासिकासद्दलक्खणं। अब्यत्ताक्खरता। फरुसस्सरो। अक्खरब्यञ्जनानं अतिबहुत्तं वा अत्यप्पत्तं वा ति अनेकविधा दोसा सन्ति॥ पाळिभासा पन एतेहि दोसेहि सब्बथा विमुत्ता सद्दतो च अत्थतो च परिपुण्णा सात्थसब्यञ्जनगुणेहि समन्नागता महाभासा होति॥
एवं सात्थसब्यञ्जनगुण समन्नागतत्ता बुद्धमुखपाठं परियत्तिं रक्खितुं समत्था भासा होति। तस्मा "पाति रक्खतीति पाळि" इिति वचनत्थानुरूपं पाळि त्येव वुच्चति॥ इमिस्सा पाळिभासाया आवस्सिकत्तं विनयपिटके अधिप्पायतो अतिविय पाकटं होति॥ तं चिरट्ठितं चन॥ पब्बज्जा। उपसम्पदा कम्मवाचादिनि अञ्ञाय भासाय धारेत्वा निप्फादेतुं न सक्कोन्ति। पाळिभासायेव सुविहितं रुळ्हिय वाचेत्वा निप्फादेतब्बानि होन्ति॥ पि च। इमस्मिं कप्पे पुब्बे उप्पन्ना ककुसन्धादिनो बुद्धा च। पुब्बे कप्पेसु उप्पन्नपुब्बा बुद्धा च इमाय पाळिभासायेव वेनेय्यसत्तानं सधम्मं देसेन्ति॥ अम्हेहि सरणं गतो गोतमसम्मासम्बुद्धोपि वेनेय्यानं धम्मामतं पायेत्वा अनुसासन्तो इमाय पाळिभासायेव देसेसि॥ अनागते उप्पज्जिस्सन्ता बुद्धापि पाळिभासायेव धम्मं देसेस्सन्ति॥ तिपिटकसङ्खातं परियत्तिधम्मं संगायन्ता आयस्मा महाकस्सपादयो महाथेरापि पाळिभासायेव संगायिंसू॥ पाळिभासा नाम वित्थारताय अतिगम्भीरा महाभासा होति। तस्मा पद। पाठ। कम्म। कत्तादि-नयानं परिवत्तन निम्मित मग्गे धारेन्ता अनेकेसु सद्दसत्थेसु पुराणाचरियेहि गन्था रचिता होन्ति॥
एसा पाळिभासा मरम्मरट्ठं अनुरुद्धदेवमहाराजस्स कालतो पुब्बेपि पत्ता। अनुरुद्धराजस्स काले महाथेरस्स अरहन्तस्स आनुभावेन अतिविय विरूळ्हा आसि॥ ततो पट्ठाय बुद्धमामका मरम्मराजानो पाळिभासां अतिविय उपत्थम्भेसुं॥ तस्मा पुकं समये मरम्मरट्ठे जना सब्बेसम्पि पाळिभासां परिसीलेन्ति॥ इत्थियोपि ओदनं पचन्तियो उदकं आहरन्तियो पाळिभासां लिखन्ति ति आमणना सन्ति॥ तस्मिं काले अञ्ञतरा इत्थियो पाळिचापे परं वाचेतुं सक्कोन्ति। सत्थगन्थे रचयितुं सक्कोन्ति तिपि अनुस्सति सन्ति॥ विभत्यत्थ नाम सद्दन्तरगन्थो जयसीह राजस्स धीताय रचितो सद्दगन्थो होति॥ अपि च जयसीहराजस्स धीता थान प्यिनराजकुमारी चापं वाचेन्तिं भिक्खुपि उपसंकमित्वा उग्गण्हन्ति ति। अञ्ञतरो तिस्सा सिस्सभिक्खु थान प्यिनराजकुमारिया सम्बन्धं आकङ्खित्वा राजिनो सन्तिके याचिते "एकं गन्थं रचयितुं सक्कोन्तोयेव मामकीं धीतरं लभिस्सति" ति राजा आणापेसि॥ तदा थेरो न्यासगन्थस्स अत्थसंवण्णनायी तीकागन्थं पाळिभासाय रचयित्वा राजिनो उपहरति। राजा पसन्नमानसो धीतरं तस्सा पादमूलिकं अदासि ति राजवंसेसु सुय्यति॥ अज्जतने पन पाळिभासां भिक्खुविहारेसु च विज्जालयेसु चेव अभियुञ्जित्वा परिसीलेन्ति॥ पुब्बे विय जना सब्बे न उस्सहन्ति॥ अत्थतो पन बुद्धवादिनो सब्बेसम्पि परिसीलितब्बा होति॥ हेतु पन: सम्मासम्बुद्धस्स अनुसासनि। मग्ग फल निब्बान पत्ति मग्गो तिपिटकभासांसुयेव तिट्ठति॥ तिपिटकचापं पाळिभासायेव सण्ठितं॥ मरम्मभासाय परिवत्तिता पिटकगन्था सन्ति। निज्जटं पाळिभासां सयं जानन्तो पुग्गलो यावता सब्बं जानाति। तावता मरम्मभासामत्तेन ञातुं न सक्कोति॥ अपि च मरम्मभासाय अन्तो सील। समाधि। पञ्ञा आदीनि पाळिवोहारानि यावता सक्कोन्ति इध पाविसिंसू। तस्मा अज्जपि पाळिभासा मरम्मभासायेव ति आसंकितुं वट्टति॥ मरम्मभासाय रचितेसु गन्थेसु तानि पाळिवोहारानि पाविसेत्वा लिखितत्ता पाळिं अकुसलो पुग्गलो मरम्मभासां सम्मा तिरच्छातुं दुक्करं होति॥
भासाबेद
[सम्पादेतु]अक्खरानि
[सम्पादेतु]पाळिभासायं अुपयुत्तानि अक्खरानि एकचत्तालीस (४१) होन्ति॥ तानि एकचत्तालीस अक्खरानि अट्ठ (८) सरा च। तेत्तिंस (३३) ब्यञ्जनानि च ति द्विधा विभत्तानि होन्ति॥
सरा (८)
[सम्पादेतु]सरा (८) नाम: "अ (a)ⓘ। आ (ā)ⓘ। इ (i)ⓘ। इी (ī)ⓘ। उ (u)ⓘ। उू (ū)ⓘ। ए (e)ⓘ। ओ (o)ⓘ" ति होन्ति॥
| मूलसरा | गुणसर | वुद्धिसरा
(पाळिभासायं न यूज्यते। सक्कते यूज्यते। पाळिरूपसिद्धियं उपकारकं होति॥) | ||
|---|---|---|---|---|
| सरयुगळानि | रस्ससरा
(अलहुस्सरा) |
दीघसर
(लहुस्सरा) |
||
| पठमा रस्सदीघयुगळा | अ (a)ⓘ | आ (ā)ⓘ | ||
| दुतिया रस्सदीघयुगळा | इ (i)ⓘ | इी (ī)ⓘ | ए (e)ⓘ | ओ (o)ⓘ |
| ततिया रस्सदीघयुगळा | अु (u)ⓘ | अू (ū)ⓘ। | ओ (o)ⓘ | ओो (ou)ⓘ |
तेसु अट्ठसु सरेसु "अ (a)ⓘ। आ (ā)ⓘ। इ (i)ⓘ। इी (ī)ⓘ। उ (u)ⓘ। उू (ū)ⓘ। ए (e)ⓘ। ओ (o)ⓘ" ति एते अट्ठानुरूपा मूलसरा नाम होन्ति॥ "ए (e)ⓘ। ओ (o)ⓘ" ति सरा पन तेहि मूलसरेहि अभिवुद्धिं पत्ता सरा होन्ति। तस्मा "गुणसरा" ति वुच्चन्ति॥ [नोट १] सरो नाम "अ (a)ⓘ। आ (ā)ⓘ + इ (i)ⓘ। इी (ī)ⓘ" ति एतेसं संयोगेन भवितो होति॥
मूलसरेसु ६ सरेसु "अ (a)ⓘ। इ (i)ⓘ। उ (u) ⓘ" ति एते रस्ससरा नाम होन्ति॥ "आ (ā)ⓘ। इी (ī)ⓘ। उू (ū)ⓘ" ति एते दीघसरा नाम होन्ति॥ "अ (a)ⓘ। आ (ā)ⓘ" ति पठमं यूयं॥ "इ (i)ⓘ। इी (ī)ⓘ" ति दुतियं यूयं॥ "उ (u) ⓘ। उू (ū)ⓘ" ति ततियं यूयं॥ एवं मूलसरा (६) तयो रस्सदीघयुगळा होन्ति॥
ब्यञ्जनानि ३३
[सम्पादेतु]ब्यञ्जनानि वग्गब्यञ्जनं च अवग्गब्यञ्जनञ्च ति द्विधा ठितानि॥ 'वग्गब्यञ्जनं' नाम वग्ग आकारेन संगहितानि ब्यञ्जनानि होन्ति॥ 'अवग्गब्यञ्जनं' नाम वग्गतो मुत्तानि ब्यञ्जनानि होन्ति॥ वग्गब्यञ्जनानि पञ्चवीसति (२५)। अवग्गब्यञ्जनानि अट्ठ (८) होन्ति॥
तानि ब्यञ्जनानि अेतेनाकारेन तिट्ठन्ति॥
वग्गब्यञ्जनानि २५
[सम्पादेतु]| ठानानि | पथम | दुतिय | ततिय | चतुत्थ | पञ्चम | वग्गो |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ कण्ठजं
(कण्ठे भवा अक्खरा) |
क
(ka)ⓘ |
ख
(kha)ⓘ |
ग
(ga)ⓘ |
घ
(gha)ⓘ |
ङ
(ṅa)ⓘ |
(क वग्गो) |
| २ तालुजं
(तालुस्मिं भवा अक्खरा) |
च
(ca)ⓘ |
छ
(cha)ⓘ |
ज
(ja)ⓘ |
झ
(jha)ⓘ |
ञ्ञ
(ña)ⓘ |
(च वग्गो) |
| ३ मुद्धजं
( मुद्धनि भवा अक्खरा) |
ट
(ṭa)ⓘ |
ठ
(ṭha)ⓘ |
ड
(ḍa)ⓘ |
ढ
(ḍha)ⓘ |
ण
(ṇa)ⓘ |
(ट वग्गो) |
| ४ दन्तज
(दन्तेसु भवा अक्खरा) |
त
(ta)ⓘ |
थ
(tha)ⓘ |
द
(da)ⓘ |
ध
(dha)ⓘ |
न
(na)ⓘ |
(त वग्गो) |
| ५ ओट्ठजं
(ओट्ठे भवा अक्खरा) |
प
(pa)ⓘ |
फ
(pha)ⓘ |
ब
(ba)ⓘ |
भ
(bha)ⓘ |
म
(ma)ⓘ |
(प वग्गो) |
अवग्गब्यञ्जनानि ८
[सम्पादेतु]य (ya) ⓘ। र (ra) ⓘ। ल (la) ⓘ। व (va) ⓘ। स (sa) ⓘ। ह (ha) ⓘ। ळ (ḷa) ⓘ। अं (ṃ) ⓘ॥
निस्सै
[सम्पादेतु]- ↑ Nagrajji (2003) "Pali language and the Buddhist Canonical Literature". Agama and Tripitaka, vol. 2: Language and Literature.
- ↑ Hazra, Kanai Lal. Pāli Language and Literature; a systematic survey and historical study. D.K. Printworld Lrd., New Delhi, 1994, page 19.
- ↑ Hirakawa, Akira. Groner, Paul. A History of Indian Buddhism: From Śākyamuni to Early Mahāyāna. 2007. p. 119
- See entries for "Pali" (written by K. R. Norman of the Pali Text Society) and "India--Buddhism" in The Concise Encyclopedia of Language and Religion, (Sawyer ed.) ISBN 0-08-043167-4
- Müller, Edward (1995) [First published 1884]. Simplified Grammar of the Pali Language. Asian Educational Services. ISBN 81-206-1103-9.
- Silva, Lily de (1994). Pali Primer (first ed.). Vipassana Research Institute Publications. ISBN 81-7414-014-X.
- Warder, A. K. (1991). Introduction to Pali (third ed.). Pali Text Society. ISBN 0-86013-197-1.
लिंक
[सम्पादेतु]- Pali Text Society, London. The Pali Text Society's Pali-English dictionary. Chipstead, 1921-1925.
- Pali Text Society पटिरूप:Webarchive
- Reconstruction of Ancient Indian sound clusters on the basis of Pali sounds (according to "Grammatik des Pali" by Achim Fahs)
- Buddhadatta Mahāthera, A. P. (1958). Concise Pāli-English Dictionary. पटिरूप:Webarchive
- ↑ अधिप्पायो पन: "ए (e)ⓘ" सरो नाम "अ (a)ⓘ। आ (ā)ⓘ + इ (i)ⓘ। इी (ī)ⓘ" ति एतेसं संयोगेन भवितो होति॥ "ओ (o)ⓘ"
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